मन मौजी रे…!

ये वो राहे है,
न जो रुकती है,
न जो थकती है,
मंजीलही जो पाये…
मन मौजी रे,
ये कोनसा रोग लगाये…

कुछ शीशे भी ,
कुछ पत्थर भी,
कुछ टूटे भी,
इरादेही न बिखर पाये…
मन मौजी रे,
ये कोनसा रोग लगाये…

चाहे जो तु,
पाये वो तु,
बस तुही तु,
जमाने तो बिखर जाये…
मन मौजी रे,
ये कोनसा रोग लगाये…

एक कतरा मैं,
एक ख्वाईश मैं,
एक बूँद मैं,
बस बूँदमेही मील जाये…
मन मौजी रे,
ये कोनसा रोग लगाये…

थोडी उलझनही,
थोडी गलतीही,
थोडी अपनीही,
जींदगी यूँ न सिमट जाये…
मन मौजी रे,
ये कोनसा रोग लगाये…

-J speaks…